नालंदा की सुशीला देवी ने नर्सरी से बदली किस्मत, आत्मनिर्भरता के साथ पर्यावरण संरक्षण की बनीं मिसाल
थरथरी (नालंदा)। बिहार के नालंदा जिले के एक छोटे से गांव चैनपुर की रहने वाली सुशीला देवी ने अपने हौसले और मेहनत के दम पर आत्मनिर्भरता की एक ऐसी कहानी लिखी है, जो आज पूरे क्षेत्र के लिए प्रेरणा बन चुकी है। जीविका दीदी के रूप में पहचान रखने वाली सुशीला देवी ने पर्यावरण संरक्षण को अपनी आजीविका का आधार बनाकर न सिर्फ अपनी जिंदगी बदली, बल्कि कई अन्य लोगों को भी रोजगार का अवसर दिया।
कोरोना काल वर्ष 2019 में एक छोटे से प्रयास के रूप में शुरू हुई उनकी पहल आज एक सफल और संगठित नर्सरी के रूप में विकसित हो चुकी है। सीमित संसाधनों के बीच शुरू किया गया यह काम अब लगातार विस्तार की ओर बढ़ रहा है।
सरकारी योजना से मिला सहारा, बढ़ा काम का दायरा
सुशीला देवी ने बिहार सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन विभाग के तहत नालंदा वन प्रमंडल, बिहारशरीफ द्वारा संचालित मुख्यमंत्री निजी अन्य प्रजाति पौधशाला योजना से जुड़कर अपने कार्य को नई दिशा दी। इस योजना के सहयोग से उनकी नर्सरी में अब विभिन्न प्रकार के पौधों का उत्पादन किया जा रहा है।
वर्तमान में उनकी पौधशाला में लकड़ी के 10 प्रकार, फलदार 10 प्रकार और फूलों के 13 प्रकार के पौधे तैयार किए जाते हैं। वे बीजू और साटा दोनों तरह के पौधों का उत्पादन करती हैं, जिनकी मांग नालंदा के साथ-साथ आसपास के जिलों में भी तेजी से बढ़ रही है।
फूलों के पौधों से बढ़ी आमदनी, सालाना लाखों की कमाई
सुशीला देवी की आय का प्रमुख स्रोत फूलों के पौधों की बिक्री है। बाजार में इनकी अच्छी मांग के चलते उन्हें बेहतर कीमत मिल रही है। इस व्यवसाय से वे सालाना करीब 3 से 4 लाख रुपये तक की कमाई कर रही हैं।
सिर्फ खुद ही नहीं, उन्होंने इस कार्य के जरिए 7 से 8 लोगों को स्थायी रोजगार भी उपलब्ध कराया है। इस तरह उनकी नर्सरी स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन का भी एक मजबूत केंद्र बन गई है।
महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने की दे रहीं प्रेरणा
आर्थिक रूप से सशक्त बनने के बाद सुशीला देवी अब अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार के लिए प्रेरित कर रही हैं। उनका मानना है कि अगर सही दिशा और मेहनत हो, तो छोटे स्तर से शुरू किया गया काम भी बड़े बदलाव का कारण बन सकता है। उनका यह प्रयास महिला सशक्तिकरण और पर्यावरण संरक्षण—दोनों क्षेत्रों में एक सकारात्मक उदाहरण बनकर उभरा है।
नीलगाय बनी चुनौती, फसलों को पहुंचा रही नुकसान
हालांकि, इस सफलता के बीच एक बड़ी चुनौती भी सामने है। क्षेत्र में नीलगाय का बढ़ता आतंक उनकी नर्सरी के लिए समस्या बनता जा रहा है। ये जंगली जानवर पौधों को नुकसान पहुंचा रहे हैं, जिससे उन्हें आर्थिक क्षति उठानी पड़ रही है।
पूरे पंचायत क्षेत्र में नीलगाय की समस्या किसानों और पौध उत्पादकों के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है, जिस पर प्रभावी समाधान की जरूरत महसूस की जा रही है।
