मध्य प्रदेश

मध्यप्रदेश में राजनीतिक नियुक्तियों पर ब्रेक, भाजपा में बढ़ी अंदरूनी खींचतान; अपनों की नाराजगी से अटकी सूची

भोपाल: मध्यप्रदेश भाजपा में निगम-मंडलों, बोर्डों और विकास प्राधिकरणों में राजनीतिक नियुक्तियों को लेकर अंदरूनी खींचतान तेज हो गई है। हालात ऐसे बन गए हैं कि सरकार और संगठन चाहकर भी महत्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियों की अंतिम सूची जारी नहीं कर पा रहे हैं। पार्टी के भीतर अलग-अलग गुटों की सक्रिय लॉबिंग ने मुख्यमंत्री मोहन यादव और प्रदेश भाजपा अध्यक्ष वीडी शर्मा की राह मुश्किल कर दी है।

प्रदेश में 31 से अधिक महत्वपूर्ण संस्थानों में अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। इन नियुक्तियों में लगातार हो रही देरी से संगठन और सरकार के बीच संतुलन साधना भी चुनौती बनता जा रहा है।

भोपाल विकास प्राधिकरण पर सबसे ज्यादा सियासी घमासान

राजधानी भोपाल के सबसे प्रभावशाली संस्थानों में शामिल भोपाल विकास प्राधिकरण (BDA) के अध्यक्ष पद को लेकर सबसे ज्यादा खींचतान देखने को मिल रही है।

सूत्रों के अनुसार चेतन सिंह का नाम लगभग तय माना जा रहा था, लेकिन कई मंत्रियों और विधायकों की दावेदारी और दबाव के चलते मामला उलझ गया। हर गुट चाहता है कि इस अहम पद पर उसका करीबी नेता बैठे, ताकि विकास परियोजनाओं और शहर के बुनियादी ढांचे पर प्रभाव बना रहे।

इंदौर में दिल्ली तक पहुंचा नियुक्ति विवाद

इंदौर विकास प्राधिकरण को लेकर भी राजनीतिक हलचल तेज है। बताया जा रहा है कि हरिनारायण यादव का नाम लगभग फाइनल हो चुका था, लेकिन अंतिम समय में इंदौर के एक प्रभावशाली नेता ने दिल्ली स्तर पर हस्तक्षेप कर प्रक्रिया रुकवा दी।

इस घटनाक्रम के बाद अब नए समीकरण तलाशे जा रहे हैं, जिससे दावेदारों और कार्यकर्ताओं में बेचैनी बढ़ गई है।

50 से ज्यादा नेताओं की सक्रिय लॉबिंग

भाजपा के भीतर बड़ी संख्या में ऐसे वरिष्ठ नेता हैं जिन्हें अब तक कोई राजनीतिक जिम्मेदारी नहीं मिली है। बताया जा रहा है कि करीब 50 से अधिक नेता निगम-मंडलों और आयोगों में जगह पाने के लिए सक्रिय लॉबिंग कर रहे हैं।

यही वजह है कि सरकार और संगठन दोनों पर भारी दबाव बना हुआ है और अंतिम निर्णय लेने में लगातार देरी हो रही है।

इन बड़े संस्थानों में अब तक नहीं हुई नियुक्तियां

प्रदेश के कई महत्वपूर्ण संस्थानों में अब तक अध्यक्ष और उपाध्यक्ष नियुक्त नहीं किए जा सके हैं। इनमें नीति एवं योजना आयोग, खनिज विकास निगम, पर्यटन बोर्ड, कृषि विपणन बोर्ड और पिछड़ा वर्ग कल्याण आयोग जैसे अहम संस्थान शामिल हैं।

इसके अलावा गौपालन एवं पशु संवर्धन बोर्ड, मदरसा बोर्ड और महाकौशल व बुंदेलखंड जैसे क्षेत्रीय विकास प्राधिकरणों में भी नियुक्तियां लंबित हैं, जिससे कई स्तरों पर कामकाज प्रभावित हो रहा है।

सरकारी खजाने पर बढ़ेगा वित्तीय बोझ

राजनीतिक नियुक्तियों का एक बड़ा पहलू सरकारी खर्च भी माना जा रहा है। किसी अध्यक्ष या उपाध्यक्ष की नियुक्ति के साथ सरकारी वाहन, कार्यालय, स्टाफ और अन्य सुविधाएं भी जुड़ जाती हैं।

विशेषज्ञों के अनुसार एक राजनीतिक नियुक्ति पर हर महीने औसतन 3 से 5 लाख रुपये तक का अतिरिक्त खर्च आता है, जिसका भार सरकारी खजाने पर पड़ता है।

पुराने नेताओं को जिम्मेदारी मिलने से बढ़ी नाराजगी

हाल में हुई कुछ नियुक्तियों ने पार्टी के भीतर असंतोष और बढ़ा दिया है। विनोद गोटिया, सत्येंद्र भूषण सिंह और महेंद्र सिंह यादव जैसे नेताओं को दोबारा जिम्मेदारी दिए जाने से नए कार्यकर्ताओं और युवा नेताओं में नाराजगी बताई जा रही है।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा नेतृत्व फिलहाल सत्ता और संगठन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश में जुटा है, लेकिन अंदरूनी गुटबाजी नियुक्तियों की राह में बड़ी बाधा बनती नजर आ रही है।