ऑनलाइन गेम और मोबाइल की लत बच्चों को बना रही मानसिक रूप से बीमार, पेरेंट्स के लिए डॉक्टरों की चेतावनी और जरूरी सलाह
देहरादून। तकनीक ने बच्चों की पढ़ाई और जानकारी के दायरे को जरूर बढ़ाया है, लेकिन इसका जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल अब गंभीर चिंता का विषय बनता जा रहा है। मोबाइल फोन और ऑनलाइन गेम बच्चों को किताबों, खेल मैदानों और दोस्तों से दूर कर रहे हैं। लगातार स्क्रीन पर समय बिताने से बच्चे धीरे-धीरे मानसिक समस्याओं की ओर बढ़ रहे हैं, जिसे विशेषज्ञ बेहद खतरनाक संकेत मान रहे हैं।
गाजियाबाद में ऑनलाइन गेम की लत के चलते तीन मासूम बहनों की जान जाने की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस दर्दनाक मामले ने अभिभावकों, शिक्षकों और काउंसलर्स के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर बच्चों को इस डिजिटल जाल से कैसे बचाया जाए।
स्क्रीन टाइम बढ़ने से बिगड़ रहा बच्चों का मानसिक संतुलन
काउंसलर्स और मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि अत्यधिक स्क्रीन टाइम और ऑनलाइन गेमिंग बच्चों के मानसिक विकास को गहराई से प्रभावित कर रही है। इसका असर बच्चों के व्यवहार में साफ दिखाई देने लगा है। चिड़चिड़ापन, जिद्दीपन, मानसिक असंतुलन और गुस्सा अब आम लक्षण बनते जा रहे हैं। बच्चों की एकाग्रता कम हो रही है और वे छोटी-छोटी बातों पर आक्रामक हो जाते हैं।
मोबाइल के बिना बेचैन हो रहे बच्चे
विशेषज्ञों के अनुसार, मोबाइल की लत इस कदर बढ़ चुकी है कि बच्चे फोन न मिलने पर रोने लगते हैं, बेचैन हो जाते हैं और कई बार हिंसक व्यवहार तक करने लगते हैं। ऑनलाइन गेम्स में आगे बढ़ने की होड़ में बच्चे इस कदर उलझ जाते हैं कि उन्हें मोबाइल स्क्रीन के बाहर की दुनिया का एहसास ही नहीं रहता।
माता-पिता की दूरी बन रही बड़ी वजह
इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ साइकोमेट्रिक काउंसलिंग के अध्यक्ष डॉ. मुकुल शर्मा का कहना है कि बच्चों में ऑनलाइन गेमिंग की बढ़ती लत के पीछे सबसे बड़ी वजह माता-पिता का समय न देना है। बच्चों की असली पूंजी उनके माता-पिता होते हैं, लेकिन जब अभिभावक उनसे भावनात्मक रूप से दूर हो जाते हैं, तो बच्चे इंटरनेट, गेम और सोशल मीडिया की दुनिया में शरण लेने लगते हैं। माता-पिता ही बच्चों के पहले काउंसलर होते हैं।
अकेलापन और लक्ष्यहीनता बढ़ा रही खतरा
न्यूरो साइकोलॉजिस्ट और सीबीएसई काउंसलर डॉ. सोना कौशल गुप्ता के अनुसार, ऐसे बच्चे जो स्कूल नहीं जाना चाहते, दोस्तों से नहीं मिलते और खेलकूद से दूरी बना लेते हैं, वे धीरे-धीरे खुद को समाज से अलग कर लेते हैं। घर में भावनात्मक सहारा न मिलने पर मोबाइल ही उनकी ‘इमोशनल डाइट’ बन जाता है, जो भविष्य में गंभीर मानसिक समस्याओं का कारण बन सकता है।
पेरेंट्स इन बातों का रखें खास ध्यान
बच्चों के सामने मोबाइल का इस्तेमाल कम से कम करें, ताकि वे उसे आदत न बनाएं।
दो से तीन साल तक के बच्चों को स्क्रीन से पूरी तरह दूर रखना बेहद जरूरी है।
माता-पिता बच्चों के साथ दोस्ताना व्यवहार करें, ताकि वे बिना डर अपनी बात साझा कर सकें।
बच्चों को संस्कार, सभ्यता और संस्कृति से जोड़ें, जिससे उनका मानसिक संतुलन मजबूत रहे।
बच्चों के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाए रखें और इस बात पर नजर रखें कि वे मोबाइल पर कितना समय और क्या देख रहे हैं।
