राजस्थान में 4 साल बाद फिर लौटा लंपी का कहर, 10 हजार से ज्यादा गोवंश संक्रमित; 6 की मौत से बढ़ी चिंता
जयपुर: राजस्थान में चार साल बाद लंपी वायरस ने एक बार फिर दस्तक दी है। प्रदेश में 10 हजार से ज्यादा गोवंश संक्रमण की चपेट में आ चुका है। इनमें 5,500 से अधिक मामले अभी सक्रिय हैं, जबकि छह गोवंश की मौत की पुष्टि हुई है। सबसे ज्यादा चिंता भरतपुर संभाग को लेकर है, जहां भरतपुर, डीग, धौलपुर और करौली समेत कई जिलों में संक्रमण तेजी से फैल रहा है।
पशुपालन विभाग ने छुट्टियां रद्द कीं
हालात और बिगड़ने की आशंका को देखते हुए पशुपालन विभाग ने अधिकारियों और कर्मचारियों की छुट्टियां रद्द कर दी हैं। संक्रमण की निगरानी और रोकथाम के लिए परामर्श भी जारी किया गया है। हालांकि, शत-प्रतिशत टीकाकरण के दावे के बावजूद हजारों पशुओं के संक्रमित होने से विभाग की तैयारियों पर सवाल उठ रहे हैं।
2022 में गई थी 75 हजार से ज्यादा गोवंश की जान
राजस्थान में वर्ष 2022 के दौरान लंपी ने बड़े पैमाने पर कहर बरपाया था। खासतौर पर पश्चिमी राजस्थान में इसका व्यापक असर देखने को मिला था। सरकारी आंकड़ों के अनुसार उस दौरान 75 हजार से ज्यादा गोवंश की मौत हुई थी। चार साल बाद वायरस की वापसी ने पशुपालकों की चिंता फिर बढ़ा दी है।
लंपी संक्रमित पशुओं के शरीर पर गांठ और फोड़े पैदा करती है। संक्रमण गंभीर होने पर पशु की हालत बिगड़ सकती है। यह बीमारी एक पशु से दूसरे पशु में तेजी से फैलने की क्षमता रखती है।
टीकाकरण के बावजूद संक्रमण क्यों, एंटीबॉडी जांच से होगी पड़ताल
वर्ष 2022 में जब लंपी का प्रकोप सामने आया था, तब इसके लिए टीका उपलब्ध नहीं था। इसके बाद पशुपालन विभाग ने गॉट पॉक्स वैक्सीन के जरिए हर साल टीकाकरण शुरू किया। इस बार भी विभाग ने शत-प्रतिशत टीकाकरण का दावा किया है।
अब संक्रमण सामने आने के बाद विभाग पशुओं के नमूने लेकर एंटीबॉडी की जांच करेगा। इसके जरिए यह पता लगाने की कोशिश होगी कि टीका लगने के बाद पशुओं में पर्याप्त प्रतिरोधक क्षमता विकसित हुई या नहीं।
वहीं, विभागीय दिशा-निर्देशों के मुताबिक संक्रमित या संक्रमण के केंद्र वाले इलाकों में बाहर से भीतर की ओर स्वस्थ पशुओं का टीकाकरण किया जाना चाहिए। प्रत्येक पशु के लिए अलग सुई और सिरिंज का इस्तेमाल तथा निगरानी के लिए अलग टीम की व्यवस्था भी जरूरी है। ऐसे में इन नियमों के जमीनी स्तर पर पालन को लेकर सवाल उठ रहे हैं।
2 से 8 डिग्री तापमान जरूरी, कई उपकेंद्रों में बिजली व्यवस्था पर सवाल
लंपी से बचाव के लिए इस्तेमाल होने वाली वैक्सीन की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उसे 2 से 8 डिग्री सेल्सियस तापमान पर रखना जरूरी है। लेकिन कई पशु चिकित्सा उपकेंद्रों में बिजली कनेक्शन तक नहीं होने की बात सामने आ रही है। ऐसे में वहां वैक्सीन की जरूरी तापमान व्यवस्था कैसे कायम रखी गई, इस पर सवाल उठ रहे हैं।
एक ओर विभाग शत-प्रतिशत टीकाकरण की बात कर रहा है, वहीं दूसरी ओर वैक्सीन के सुरक्षित भंडारण की बुनियादी व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
सिरिंज और वाइल के निस्तारण पर भी उठे सवाल
संक्रमण की रोकथाम में इस्तेमाल की गई सिरिंज और वाइल का सुरक्षित निस्तारण भी अहम है। बायोमेडिकल कचरा नियमों के तहत इनके वैज्ञानिक तरीके से निस्तारण की व्यवस्था होनी चाहिए। आरोप है कि कई कर्मचारियों को इसके लिए जरूरी जमा करने वाले बैग तक उपलब्ध नहीं कराए गए।
ऐसे में इस्तेमाल की गई सामग्री के अनुचित तरीके से निस्तारण के कारण संक्रमण फैलने की आशंका को लेकर भी चिंता जताई जा रही है।
उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से आने वाले पशुओं पर निगरानी
पशुपालन विभाग के निदेशक डॉ. सुरेशचन्द मीणा के मुताबिक उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश से राजस्थान में आने वाले पशुओं के जरिए भी लंपी संक्रमण पहुंच सकता है। इसे देखते हुए बाहर से आने वाले पशुधन पर निगरानी रखने के लिए प्रशासन को निर्देश दिए गए हैं।
विभाग का कहना है कि लंपी की रोकथाम के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जा चुके हैं और लगातार निगरानी की जा रही है। संक्रमण की शुरुआत भरतपुर संभाग से सामने आई है। वहां अतिरिक्त निदेशक डॉ. खुशीराम मीणा को जिम्मेदारी दी गई है, जबकि निदेशक स्तर पर भी पूरे मामले की निगरानी की जा रही है।
