Friday, May 8, 2026
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उत्तर प्रदेश

पिता नाबालिग बच्चे की अभिरक्षा किसी को भी सौंपने का नहीं रखता पूर्ण अधिकार, हाईकोर्ट ने सिंगल बेंच का आदेश किया रद्द

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम और स्पष्ट कानूनी टिप्पणी करते हुए कहा है कि यह मान लेना गलत है कि पिता अपने नाबालिग बच्चों की अभिरक्षा किसी भी व्यक्ति को स्वतंत्र रूप से सौंप सकता है और उस निर्णय को किसी भी स्थिति में चुनौती नहीं दी जा सकती। अदालत ने इस मामले में सिंगल बेंच के आदेश को रद्द कर दिया है।

खंडपीठ ने सिंगल बेंच के फैसले को बताया कानून और नैतिकता के विपरीत
मुख्य न्यायमूर्ति अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति क्षितिज शैलेंद्र की खंडपीठ ने युवराज, आयुष्मान और अन्य की विशेष अपील पर सुनवाई करते हुए यह निर्णय दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिंगल बेंच का यह कहना कि पिता, जो नाबालिग का नैसर्गिक संरक्षक है, अपनी इच्छा से अभिरक्षा किसी को भी सौंप सकता है, किसी भी तरह से टिकने योग्य नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि ऐसा विचार कानून और नैतिकता दोनों के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है।

अभिरक्षा हस्तांतरण को चुनौती देना कानूनी रूप से संभव
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि माता-पिता में से किसी एक को यह अधिकार नहीं दिया जा सकता कि वह बिना किसी कानूनी प्रक्रिया के नाबालिग की अभिरक्षा किसी तीसरे व्यक्ति को सौंप दे और उस निर्णय को चुनौती भी न दी जा सके। अदालत ने सिंगल बेंच की इस व्याख्या को अस्वीकार कर दिया।

बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका फिर बहाल, मामला वापस सिंगल बेंच को भेजा गया
खंडपीठ ने सिंगल बेंच का आदेश रद्द करते हुए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका को पुनः बहाल कर दिया है। साथ ही निर्देश दिया है कि मामले का निस्तारण कानून के अनुसार फिर से सिंगल बेंच द्वारा किया जाए। अदालत ने यह भी कहा कि मामले में आगे की सुनवाई 4 मई को होगी।

पिता द्वारा अभिरक्षा दूसरों को सौंपे जाने पर उठा विवाद
मामले में आरोप था कि बच्चों के पिता ने उनकी अभिरक्षा मां को देने के बजाय किसी अन्य व्यक्ति को सौंप दी, जिसे अवैध निरुद्धि माना गया। इसी आधार पर बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दाखिल की गई थी। हालांकि सिंगल बेंच ने इसे खारिज कर दिया था, जिसे अब खंडपीठ ने गलत ठहराया है।

हाईकोर्ट का एक और फैसला, अवैध नियुक्तियों पर सख्त टिप्पणी
एक अन्य मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि किसी नियुक्ति में निर्धारित चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है तो उसे अवैध माना जाएगा। कोर्ट ने वाराणसी के एक जूनियर हाईस्कूल में कार्यरत दो कर्मचारियों की याचिका खारिज करते हुए उनकी नियुक्ति को अवैध करार दिया।

नियुक्ति प्रक्रिया का पालन अनिवार्य, कोर्ट का सख्त रुख
न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की पीठ ने कहा कि नियमों के अनुसार चयन प्रक्रिया के बिना की गई नियुक्तियां वैध नहीं मानी जा सकतीं। याचिकाकर्ताओं ने शिक्षा निदेशक (बेसिक) के 20 दिसंबर 2014 के आदेश को चुनौती दी थी और सेवा सुरक्षा तथा वेतन भुगतान की मांग की थी, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार नहीं किया।