राजस्थान

दुनिया में बढ़ते युद्धों पर मोहन भागवत की चिंता: ‘हम एकत्व को नहीं पहचानते, इसलिए बढ़ रहे आक्रमण’

जैसलमेर। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने विश्व में बढ़ते संघर्षों और युद्धों को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि वर्तमान समय बेहद कठिन दौर से गुजर रहा है। उन्होंने कहा कि जब समाज और देश आपस में बंट जाते हैं, तब संघर्ष और आक्रमण की स्थितियां पैदा होती हैं। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध अभी समाप्त भी नहीं हुआ है और इसी बीच अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच भी तनाव और संघर्ष की स्थिति बन गई है।

उन्होंने कहा कि दुनिया में लगातार हो रहे टकराव का एक बड़ा कारण यह है कि लोग अपने मूल एकत्व को पहचान नहीं पा रहे हैं। जब मनुष्य यह भूल जाता है कि हम भले ही अलग-अलग दिखाई दें, लेकिन मूल रूप से एक ही हैं, तब समाज में कलह और युद्ध जैसी स्थितियां पैदा होती हैं।

मोहन भागवत जैसलमेर में जैन समुदाय के चादर महोत्सव के उद्घाटन के अवसर पर आयोजित धर्म सभा को संबोधित कर रहे थे। अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि आज लोग मन की करुणा और आपसी संबंधों की मूल भावना को भूलते जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि विविधता को अलगाव की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति ही मतभेदों को जन्म देती है। इसलिए आवश्यक है कि विविधता को स्वीकार करते हुए भी समाज अपनी एकता को न भूले।

उन्होंने इतिहास का उदाहरण देते हुए कहा कि पहला विश्व युद्ध समाप्त होने के बाद भविष्य में ऐसे युद्ध न हों, इसके लिए लीग ऑफ नेशंस की स्थापना की गई थी, लेकिन वह सफल नहीं हो सकी। इसके बाद दूसरा विश्व युद्ध हुआ और फिर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना हुई, ताकि दुनिया में शांति बनी रहे। हालांकि वर्तमान हालात यह बताते हैं कि इन संस्थाओं के बावजूद दुनिया में चल रहे संघर्ष थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।

संघ प्रमुख ने कहा कि यदि समाज के लोग अपने भेदभाव और व्यक्तिगत स्वार्थ को त्यागकर देश और समाज के लिए जीने-मरने को तैयार हो जाएं तो एक बेहतर समाज का निर्माण संभव है। उन्होंने विश्वास जताया कि यदि भारत एकजुट होकर आगे बढ़े तो वह विश्वगुरु बनकर पूरी दुनिया को एक सुखी और सुंदर दिशा दे सकता है।

उन्होंने कहा कि हम सभी मूल रूप से समान हैं क्योंकि परमात्मा एक ही है। जब समाज में अनेकता का आभास बढ़ता है और लोग अलगाव की भावना से सोचने लगते हैं तो विभाजन और टकराव की स्थिति पैदा हो जाती है। इसलिए समाज को हमेशा एकता और सद्भाव के मार्ग पर चलने का प्रयास करना चाहिए।