उत्तर प्रदेश

सतीश चंद्र मिश्रा को चुनावी कमान, 2027 से पहले मायावती फिर आजमा रहीं 2007 का ‘ब्राह्मण फॉर्मूला’

लखनऊ: उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बहुजन समाज पार्टी की रणनीति में बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। बसपा प्रमुख मायावती ने पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और प्रमुख ब्राह्मण चेहरे सतीश चंद्र मिश्रा को बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। उन्हें लीगल और मीडिया के साथ चुनाव से जुड़ी जिम्मेदारियां भी दी गई हैं। इसे मायावती की 2007 वाली सोशल इंजीनियरिंग को दोबारा मजबूत करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।

सतीश चंद्र मिश्रा को चुनाव से पहले अहम जिम्मेदारी

मायावती ने चुनावी तैयारियों के बीच सतीश चंद्र मिश्रा को पार्टी के लीगल और मीडिया मामलों के साथ चुनाव की जिम्मेदारी भी दी है। सतीश चंद्र मिश्रा लंबे समय से बसपा के प्रमुख ब्राह्मण चेहरों में शामिल रहे हैं। पार्टी अब उनके जरिए ब्राह्मण मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

यह घटनाक्रम ऐसे समय हुआ है जब मायावती हाल ही में बसपा के ब्राह्मण नेता अनंत कुमार मिश्रा को पार्टी से निष्कासित कर चुकी हैं। उत्तर प्रदेश में मायावती 2012 से सत्ता से बाहर हैं। वह चार बार प्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी हैं। 1995 में समाजवादी पार्टी और 1997 तथा 2002 में बीजेपी के सहयोग से उन्होंने सरकार बनाई थी।

2007 में मायावती ने बनाया था सोशल इंजीनियरिंग का फॉर्मूला

तीन बार गठबंधन सरकार बनाने के बाद मायावती ने 2007 के विधानसभा चुनाव में अलग रणनीति अपनाई थी। उस समय उन्होंने दलित वोट बैंक के साथ मुस्लिम और ब्राह्मण मतदाताओं को भी बसपा के साथ जोड़ने की कोशिश की थी। पार्टी ने इसे सोशल इंजीनियरिंग का नाम दिया था।

2007 के विधानसभा चुनाव में बसपा ने 86 ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट दिया था। चुनाव प्रचार के दौरान ब्राह्मण मतदाताओं को जोड़ने के लिए पार्टी ने कई अभियान चलाए। उस समय ‘ब्राह्मण शंख बजायेगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे भी चर्चा में रहे थे।

ब्राह्मण भाईचारा समितियां बनाकर चलाया था अभियान

मायावती ने उस समय ब्राह्मण भाईचारा समितियों का गठन किया था और खुद कई ब्राह्मण सम्मेलनों में पहुंचकर संबोधित किया था। इस रणनीति का चुनावी परिणाम भी बसपा के पक्ष में रहा। 2007 में बसपा के टिकट पर 41 ब्राह्मण उम्मीदवार चुनाव जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।

मायावती ने पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई और अपनी सरकार में सात ब्राह्मण नेताओं को मंत्री बनाया था। यही वजह है कि 2027 के चुनाव से पहले बसपा की मौजूदा रणनीति में 2007 के फॉर्मूले की चर्चा फिर शुरू हो गई है।

अब यूपी की बदली सियासत में कितना कारगर होगा फॉर्मूला?

उत्तर प्रदेश में बसपा 2012 से सत्ता से बाहर है। मौजूदा समय में लोकसभा में पार्टी का एक भी सांसद नहीं है। विधानसभा में बसपा का एक विधायक था, जिसका निधन हो चुका है। ऐसे में मायावती एक बार फिर ब्राह्मणों के बीच पार्टी की मौजूदगी मजबूत करने की कोशिश करती दिखाई दे रही हैं।

मायावती लगातार यह संदेश दे रही हैं कि बसपा ने हमेशा ब्राह्मण समाज का सम्मान किया है और 2027 में सरकार बनने पर ब्राह्मणों को पूरा सम्मान दिया जाएगा। हालांकि राजनीतिक जानकारों के मुताबिक 2007 और 2026 के बीच करीब 19 वर्षों में उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव आया है।

2007 के मुकाबले बदल चुका है ब्राह्मण वोट का समीकरण

2007 में उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी और सरकार के खिलाफ माहौल बताया जा रहा था। उस समय कांग्रेस और बीजेपी दोनों की स्थिति आज की तुलना में कमजोर थी। ऐसे राजनीतिक समीकरण में ब्राह्मण मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा मायावती के साथ गया था।

अब राजनीतिक परिस्थितियां अलग हैं। 2014 के बाद उत्तर प्रदेश में बीजेपी का प्रभाव लगातार मजबूत हुआ है। इसी दौरान बसपा के पारंपरिक दलित वोट बैंक में भी कमी आई है। ऐसे में मायावती के सामने 2007 की तरह ब्राह्मण और दलित समीकरण को दोबारा मजबूत करने की बड़ी चुनौती है।