30 लाख के इनामी ब्रजेश गंझू को बुलाते थे ‘सरदार जी’, ‘डॉक्टर’ के इनपुट से ऐसे घिरा टीएसपीसी सुप्रीमो
चतरा: झारखंड में प्रतिबंधित उग्रवादी संगठन टीएसपीसी के सुप्रीमो और 30 लाख रुपये के इनामी ब्रजेश गंझू को यूपी एटीएस ने मुठभेड़ में मार गिराया। ब्रजेश के खिलाफ पुलिसकर्मियों समेत कई लोगों की हत्या और अन्य आपराधिक घटनाओं से जुड़े 50 से अधिक मामले दर्ज थे। वह करीब दो दशक से पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों से बचता फिर रहा था। राज्य सरकार ने उस पर 25 लाख रुपये और एनआईए ने 5 लाख रुपये का इनाम घोषित कर रखा था।
लावालौंग थाना प्रभारी चंदन कुमार के मुताबिक, अकेले चतरा जिले में ब्रजेश के खिलाफ 39 नक्सली मामले दर्ज थे। वह गोपाल सिंह भोक्ता, दुलारचंद गंझू, रंजन गंझू, फूलचंद गंझू और ‘सरदार जी’ जैसे कई नामों से भी जाना जाता था। चतरा जिले के लावालौंग थाना क्षेत्र स्थित लूटू-सोहावन गांव का रहने वाला ब्रजेश किसान पिता स्वर्गीय पच्चु गंझू के चार बेटों में दूसरे नंबर पर था।
बाल दस्ते से शुरू हुआ उग्रवाद का सफर
ब्रजेश गंझू ने भाकपा माओवादी के बाल दस्ते से अपनी उग्रवादी गतिविधियों की शुरुआत की थी। लंबे समय तक संगठन में सक्रिय रहने के बाद उसने अपनी अलग पहचान बना ली। हालांकि, माओवादियों की हिंसा और क्षेत्र से वसूली गई लेवी की रकम बंगाल भेजे जाने की कार्यशैली से वह नाराज हो गया।
इसके बाद वर्ष 2002-03 में उसने माओवादियों को चुनौती देने के लिए नए संगठन की रणनीति तैयार की। स्थानीय माओवादी संगठनों के कई कमांडरों को साथ लेकर 2004-05 तक टीएसपीसी का गठन किया गया और संगठन पूरी तरह सक्रिय हो गया।
ब्रजेश कभी अपने गांव का निर्विरोध मुखिया भी बना था। बाद में उसने झारखंड के कोयलांचल और जंगलों में टीएसपीसी को एक कुख्यात उग्रवादी संगठन के रूप में खड़ा किया और लंबे समय तक इसका कमांडर रहा।
‘डॉक्टर’ की गिरफ्तारी के बाद शुरू हुई उल्टी गिनती
करीब दो दशक से फरार ब्रजेश गंझू की घेराबंदी पिछले साल तेज हुई, जब टीएसपीसी का सब-जोनल कमांडर उमेश सिंह खेरवार उर्फ नगीनाजी उर्फ ‘डॉक्टर’ गिरफ्तार हुआ। उस पर 5 लाख रुपये का इनाम घोषित था।
लखनऊ जेल में बंद उमेश से विभिन्न सुरक्षा एजेंसियों ने पूछताछ की। इस दौरान मिले इनपुट के आधार पर यूपी एटीएस ने ब्रजेश तक पहुंचने की रणनीति तैयार की। इससे पहले 4 सितंबर 2025 को पलामू में हुई मुठभेड़ में दो पुलिसकर्मी शहीद हुए थे। उस दौरान उमेश मौके से बच निकला था।
इसके बाद यूपी एटीएस ने 23 सितंबर 2025 को सोनभद्र से उमेश को गिरफ्तार किया। बाद में एनआईए ने भी उससे पूछताछ की। जांच और पूछताछ से मिले इनपुट पर सुरक्षा एजेंसियां करीब एक साल तक काम करती रहीं। इसी के बाद ब्रजेश की सटीक लोकेशन का पता चला और आखिरकार वह मुठभेड़ में मारा गया।
आम्रपाली कोल परियोजना से टीएसपीसी पर बढ़ा दबाव
टंडवा में सीसीएल की आम्रपाली कोल परियोजना को टीएसपीसी के पतन की बड़ी वजहों में गिना जाता है। करीब 12-13 साल पहले आम्रपाली परियोजना से जुड़े टेरर फंडिंग मामले की जांच एनआईए ने शुरू की थी। इसके बाद संगठन पर सुरक्षा एजेंसियों का दबाव लगातार बढ़ता गया।
जांच शुरू होने के बाद बीते आठ वर्षों में टीएसपीसी के लगभग सभी बड़े कमांडर या तो जेल पहुंच गए या पुलिस मुठभेड़ में मारे गए। कई ने आत्मसमर्पण भी किया। एनआईए के बढ़ते दबाव के कारण ब्रजेश भी चतरा से फरार होकर अलग-अलग जगहों पर छिपता रहा।
ब्रजेश की मौत की खबर से पैतृक गांव में पसरा सन्नाटा
ब्रजेश गंझू की मौत की खबर मिलते ही चतरा के लावालौंग प्रखंड स्थित उसके पैतृक गांव लुटू-सोवान में सन्नाटा छा गया। गांव में उसकी मौत को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं होने लगीं। उसके घर के आसपास पूरे दिन शांति रही। लावालौंग चौक पर भी रविवार को सामान्य दिनों की तरह भीड़ नहीं दिखाई दी।
रविवार सुबह लावालौंग थाना पुलिस दो बार गांव पहुंची और ब्रजेश के बड़े भाई एवं पूर्व विधायक गणेश गंझू को उसकी मौत की जानकारी दी। समाचार लिखे जाने तक ब्रजेश का शव पैतृक गांव लाने की तैयारी की जा रही थी।
माओवादियों से लड़ते-लड़ते खुद बन गया उग्रवादी संगठन का प्रमुख
वर्ष 2007 तक टीएसपीसी ने चतरा और आसपास के इलाकों में माओवादियों के प्रभाव को काफी हद तक खत्म कर दिया था। एक ओर संगठन पुलिस को माओवादियों से जुड़ी खुफिया सूचनाएं देता था, वहीं दूसरी ओर खुद भी उनके खिलाफ हथियारबंद संघर्ष करता था।
बाद के वर्षों में टीएसपीसी ने कोल परियोजनाओं से जुड़े कारोबारियों और ट्रांसपोर्टरों से लेवी वसूलना शुरू कर दिया। अपने प्रभाव के दौर में ब्रजेश गंझू ने सामाजिक और राजनीतिक गतिविधियों में भी दखल बढ़ाया। अपने भाई गणेश गंझू को विधायक बनाने में भी उसकी भूमिका बताई जाती रही है।
माओवादियों के खिलाफ कार्रवाई और शुरुआती दौर में विकास कार्यों को गति देने के बाद टीएसपीसी भी लेवी वसूली और आपराधिक घटनाओं में शामिल होने लगी। इसके बाद पुलिस ने संगठन के खिलाफ अभियान तेज कर दिया।
पिछले एक दशक में सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के चलते टीएसपीसी के एक दर्जन से अधिक शीर्ष कमांडर या तो मुठभेड़ में मारे गए, जेल पहुंचे या उन्होंने आत्मसमर्पण कर दिया। वहीं, ब्रजेश गंझू भेष बदलकर अलग-अलग राज्यों में छिपता रहा और सुरक्षा एजेंसियों से बचने के लिए उसने करीब दर्जनभर नामों का इस्तेमाल किया।
