Monday, July 27, 2026
Latest:
अन्य राज्य

CWG 2026: ₹3 हजार की कमाई, एक साइकिल और वर्षों का संघर्ष… ऐसे बनीं भारत की ‘सिल्वर गर्ल’ ज्ञानेश्वरी यादव

राजनांदगांव: कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में भारत के लिए रजत पदक जीतने वाली 53 किलोग्राम वर्ग की वेटलिफ्टर ज्ञानेश्वरी यादव की सफलता सिर्फ एक मेडल की कहानी नहीं, बल्कि वर्षों के संघर्ष, परिवार के त्याग और अटूट मेहनत का परिणाम है। स्कॉटलैंड के ग्लासगो में देश का मान बढ़ाने वाली ज्ञानेश्वरी ने एक बार फिर साबित कर दिया कि सीमित संसाधन भी बड़े सपनों की राह नहीं रोक सकते।

पिता की मेहनत ने बनाई चैंपियन बेटी

ज्ञानेश्वरी यादव की खेल यात्रा राजनांदगांव की जय भवानी व्यायामशाला से शुरू हुई। उनके पिता दीपक यादव बॉडी बिल्डिंग करते थे। सातवीं कक्षा में पढ़ाई के दौरान ज्ञानेश्वरी भी उनके साथ व्यायामशाला जाने लगीं। बेटी की लगन को देखते हुए पिता ने कोच से वेटलिफ्टिंग का प्रशिक्षण दिलाने का आग्रह किया। उसी दिन से शुरू हुआ सफर आज अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंच चुका है।

आर्थिक तंगी के बीच भी नहीं टूटा हौसला

परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद साधारण थी। पिता इलेक्ट्रिशियन का काम कर हर महीने लगभग तीन से पांच हजार रुपये कमाते थे। इसी आय से पूरे परिवार का खर्च, बच्चों की पढ़ाई और ज्ञानेश्वरी की डाइट, खेल उपकरण, जूते तथा प्रतियोगिताओं का खर्च उठाया जाता था। कई बार परिवार ने अपनी जरूरतों से समझौता किया, लेकिन बेटी की तैयारी में कभी कमी नहीं आने दी।

रोज साइकिल से तय होता था संघर्ष का सफर

ज्ञानेश्वरी के पिता रोज गांव भोड़िया से करीब आठ किलोमीटर साइकिल चलाकर बच्चों को राजनांदगांव लेकर आते थे। दिनभर स्कूल और अभ्यास के बाद देर रात पूरा परिवार उसी साइकिल से वापस गांव लौटता था। घर पर मां दुर्गा यादव सीमित संसाधनों में परिवार की जिम्मेदारियां संभालते हुए हर दिन नए संघर्ष का सामना करती थीं।

20-20 घंटे काम कर जुटाए प्रशिक्षण के संसाधन

दीपक यादव का कहना है कि उन्होंने कई बार 20-20 घंटे तक काम किया, लेकिन बेटी की डाइट और प्रशिक्षण से कभी समझौता नहीं किया। पासपोर्ट बनवाने से लेकर अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं तक भेजने की हर तैयारी समय रहते पूरी की गई। उनका विश्वास था कि कठिन संघर्ष ही बेटी को मजबूत खिलाड़ी बनाएगा।

पहली सफलता बनी करियर का टर्निंग प्वाइंट

वर्ष 2017 में दुर्ग में आयोजित राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में ज्ञानेश्वरी ने कांस्य पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का पहला बड़ा परिचय दिया। इसके बाद 2022 में जूनियर महिला वेटलिफ्टिंग प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीतने के बाद उनका चयन पटियाला स्थित राष्ट्रीय प्रशिक्षण केंद्र के लिए हुआ। यहीं से उनके अंतरराष्ट्रीय करियर ने नई उड़ान भरी।

अंतरराष्ट्रीय मंच पर लगातार बढ़ाया भारत का गौरव

ज्ञानेश्वरी ने वर्ष 2022 से लगातार अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत के लिए पदक जीतकर अपनी पहचान बनाई। वर्ष 2023 में कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप के जूनियर और सीनियर दोनों वर्गों में स्वर्ण पदक अपने नाम किए। 2024 विश्व चैंपियनशिप में भारत का प्रतिनिधित्व किया, 2025 राष्ट्रीय खेलों में स्वर्ण पदक जीता और 2026 एशियाई सीनियर वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रजत और कांस्य पदक हासिल किए। अब कॉमनवेल्थ गेम्स 2026 में रजत पदक जीतकर उन्होंने एक और बड़ी उपलब्धि अपने नाम कर ली है।

सरकारी नौकरी मिली, लेकिन संघर्ष अभी भी जारी

ज्ञानेश्वरी को वर्ष 2023 में छत्तीसगढ़ सरकार ने सहायक उप निरीक्षक पद पर नियुक्त किया। हालांकि परिवार की आर्थिक चुनौतियां पूरी तरह खत्म नहीं हुई हैं। राजनांदगांव में लिया गया घर अभी भी ऋण पर है और उसकी किस्तें पूरा परिवार मिलकर चुका रहा है। ऐसे में हर पदक उनके परिवार के वर्षों के संघर्ष और त्याग का सम्मान बनकर सामने आता है।

जन्मदिन से ज्यादा अहम था अभ्यास

ज्ञानेश्वरी के पिता बताते हैं कि बेटी ने बचपन से ही सामान्य जीवन की कई खुशियों का त्याग किया। जन्मदिन, दोस्तों के साथ समय और पारिवारिक कार्यक्रमों से ज्यादा महत्व हमेशा अभ्यास को दिया। वर्षों तक उनका जीवन स्कूल, व्यायामशाला और बारबेल तक सीमित रहा। इसी अनुशासन और समर्पण ने उन्हें भारत की भरोसेमंद वेटलिफ्टरों में शामिल कर दिया।