छत्तीसगढ़

आस्था के टकराव ने लिया हिंसक रूप: सुकमा में मतांतरण विवाद पर बवाल, 13 ग्रामीण घायल, कई परिवारों का पलायन

जगदलपुर : छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में आदिवासी आस्था और मतांतरण को लेकर शुरू हुआ विवाद अब हिंसा में बदल गया है। 31 मई को हुई मारपीट की घटना के बाद गांव में तनावपूर्ण सन्नाटा पसरा है। हालात ऐसे हैं कि जहां कुछ दिन पहले तक प्रार्थना की आवाजें गूंजती थीं, वहां अब सन्नाटा छाया हुआ है। इस घटना में दोनों पक्षों के 13 लोग घायल हुए हैं, जिन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

हिंसा के बाद गांव में पसरा सन्नाटा
सड्रापाल गांव में घटना के बाद हालात पूरी तरह बदल गए हैं। गांव के बीचोंबीच बनी एक झोपड़ी, जहां पहले प्रार्थना होती थी, अब टूटी-फूटी हालत में पड़ी है। अंदर बिखरी धार्मिक किताबें और टूटा दरवाजा इस बात की गवाही दे रहे हैं कि यहां हाल ही में हिंसा भड़की थी। गांव में अब ऐसा सन्नाटा है कि दूर चरती बकरियों की घंटियों की आवाज तक साफ सुनाई देती है।

6 परिवारों का पलायन, कई लोगों पर मामला दर्ज
हिंसा के बाद गांव के छह परिवारों ने अपना घर छोड़ दिया और दूसरे स्थान पर शरण लेने को मजबूर हो गए। मामले में पूर्व सरपंच हिड़मा मंडावी समेत कई ग्रामीणों के खिलाफ पुलिस ने मुकदमा दर्ज किया है।

आस्था और पहचान के टकराव से उपजा विवाद
यह मामला केवल एक हिंसक घटना नहीं, बल्कि उस सामाजिक टकराव की तस्वीर है, जो पारंपरिक आदिवासी आस्था और नई धार्मिक पहचान के बीच उभरता है। ग्रामीणों के अनुसार विवाद की जड़ें पुरानी हैं, जिसकी शुरुआत तब हुई जब गांव के सिरहा परिवार ने अपनी पारंपरिक मान्यताओं को छोड़ दिया।

सिरहा की भूमिका और बदलती धार्मिक स्थिति
आदिवासी समाज में सिरहा केवल पुजारी नहीं, बल्कि सामूहिक आस्था और देवस्थल का संरक्षक माना जाता है। ग्रामीणों का कहना है कि सिरहा पेडी की मृत्यु के बाद मिशनरी संस्था के लोगों ने परिवार को यह विश्वास दिलाया कि उनकी समस्याओं की वजह गांव के देवता हैं। इसके बाद परिवार चर्च से जुड़ गया। वहीं देवगुड़ी के पास स्थित उनकी पारंपरिक पूजा स्थल अब उजड़ चुका है।

गांव दो हिस्सों में बंटा, बढ़ा तनाव
ग्रामीणों के मुताबिक पहले पूरा गांव एकजुट होकर पूजा-पाठ करता था, लेकिन धीरे-धीरे कुछ लोग चर्च जाने लगे। इसके बाद पारंपरिक त्योहारों और अनुष्ठानों से दूरी बढ़ती गई और गांव दो गुटों में बंट गया।

जलस्रोत बना विवाद की बड़ी वजह
विवाद की सबसे बड़ी वजह गांव का एक प्राकृतिक जलस्रोत बना। गर्मियों में अन्य स्रोत सूख जाने के बाद मतांतरित समुदाय इस पवित्र जल का उपयोग प्रार्थना के लिए करने लगा। इससे ग्रामीणों को लगा कि उनकी सदियों पुरानी आस्था और प्रतीकों का अपमान हो रहा है।

31 मई को फूटा गुस्सा, हिंसा में बदला विवाद
लंबे समय से भीतर ही भीतर पनप रहा असंतोष आखिरकार 31 मई को हिंसा के रूप में सामने आया। दोनों पक्षों के बीच जमकर मारपीट हुई, जिसमें कई लोग घायल हो गए। घटना के बाद पूरे इलाके में तनाव बना हुआ है।