बिहार में रबड़ क्रांति की तैयारी! मुंगेर विश्वविद्यालय का बड़ा कदम, 4 एकड़ में शुरू होगा पायलट प्रोजेक्ट
मुंगेर: बिहार में कृषि के नए आयाम खोलने की दिशा में मुंगेर विश्वविद्यालय ने अहम पहल की है। विश्वविद्यालय अब रबड़ की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी में है। इसके तहत पायलट प्रोजेक्ट के रूप में मुंगेर के बीआरएम कॉलेज परिसर में लगभग एक कट्ठे में रबड़ का पौधा लगाया गया है, जिसने महज पांच महीने में संतोषजनक वृद्धि दिखाई है।
अगले मानसून में 4 एकड़ में होगा विस्तार
विश्वविद्यालय की योजना के अनुसार, आगामी मानसून सत्र में खगड़िया जिले के परबत्ता और खगड़िया में दो-दो एकड़, कुल चार एकड़ में रबड़ की प्रायोगिक खेती की जाएगी। यदि परिणाम उम्मीद के मुताबिक रहे तो राज्य के किसानों को बड़े पैमाने पर रबड़ की खेती के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा।
विशेषज्ञों की सहमति के बाद बना त्रिपक्षीय समझौता
सितंबर 2025 में बीआरएम कॉलेज के वनस्पति विज्ञान विभाग के शिक्षक डॉ. संदीप टाटा की पहल पर एक सेमिनार का आयोजन किया गया था। इसमें हिमालयन वन शोध संस्थान और रबड़ शोध संस्थान के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। चर्चा के बाद मुंगेर में रबड़ की खेती का प्रयोग शुरू करने पर सहमति बनी और रबड़ शोध संस्थान तथा हिमालयन वन शोध संस्थान के बीच त्रिपक्षीय समझौते को अंतिम रूप दिया गया।
हेबिया ब्राजिलियेंसिस पर चल रहा प्रयोग
डॉ. संदीप टाटा ने बताया कि वर्तमान में बीआरएम कॉलेज परिसर में ‘हेबिया ब्राजिलियेंसिस’ प्रजाति का पौधा लगाया गया है, जिसका बीज मेघालय से मंगवाया गया था। यह उष्णकटिबंधीय पेड़ 30 से 40 फीट तक ऊंचा होता है। सात वर्ष की आयु के बाद लगभग तीन वर्षों तक इससे रबड़ का उत्पादन किया जा सकता है। शुरुआती पांच महीनों में पौधे की वृद्धि उत्साहजनक रही है।
खगड़िया में रशियन डंडेलियन और गुआयुली पर भी प्रयोग
खगड़िया में ‘रशियन डंडेलियन’ प्रजाति को भी प्रायोगिक तौर पर लगाया जाएगा। यह शाकीय पौधा है, जिसकी जड़ों से रबड़ प्राप्त होता है और इसका जीवन चक्र करीब छह महीने का होता है। क्षेत्र में लगभग चार महीने पड़ने वाली ठंड को देखते हुए इसके सफल उत्पादन की संभावना जताई गई है।
इसके अलावा ‘गुआयुली’ (पार्थेनियम अर्जेंटेटम) प्रजाति पर भी प्रयोग किया जाएगा, जो ठंडे इलाकों में विकसित होती है और रबड़ उत्पादन के लिए उपयोगी मानी जाती है।
टायर से लेकर रक्षा और चिकित्सा तक उपयोग
प्राकृतिक रबड़ की मांग परिवहन, रक्षा और चिकित्सा क्षेत्र में लगातार बनी रहती है। टायर निर्माण, विशेषकर वायुयान के टायरों में प्राकृतिक रबड़ का व्यापक उपयोग होता है क्योंकि यह अपेक्षाकृत कम ज्वलनशील होता है। चिकित्सा क्षेत्र में दस्ताने, कैथेटर सहित कई उपकरणों के निर्माण में इसका इस्तेमाल किया जाता है।
लागत की बात करें तो प्रति एकड़ बीज पर लगभग 15 हजार रुपये और उर्वरक व अन्य मदों पर करीब 56 हजार रुपये प्रतिवर्ष खर्च आने का अनुमान है। विश्वविद्यालय को उम्मीद है कि यह पहल सफल रही तो बिहार में रबड़ की खेती किसानों के लिए आय का नया विकल्प बन सकती है।
