छत्तीसगढ़

जब स्थानीय बोली बनी सबसे बड़ा हथियार: बस्तर में संवाद की रणनीति से बदली नक्सल विरोधी लड़ाई की दिशा

जगदलपुर। छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग में नक्सलवाद के खिलाफ चल रही लड़ाई में अब बंदूक से ज्यादा असर संवाद का दिखने लगा है। नारायणपुर जिले के अबूझमाड़ के घने जंगलों में हाल ही में खुले पांगुड़ कैंप के बाहर बेरेलटोला गांव की एक शांत दोपहर इसका उदाहरण बनकर सामने आती है। यहां पुलिस अधीक्षक Rabinson Guriya ग्रामीणों से बातचीत शुरू करते हैं, लेकिन उनकी बात तब तक पूरी नहीं होती जब तक पास खड़ा जिला रिजर्व गार्ड (डीआरजी) का जवान कचलाम उसे गोंडी भाषा में दोहराता नहीं। ग्रामीण भी उसी के जरिए अपनी बात हिंदी में बताते हैं। यह छोटा सा दृश्य बताता है कि बस्तर में सुरक्षा की असली कुंजी अब संवाद बन चुका है।

बंदूक से जंग जीती जा सकती है, लेकिन दिल नहीं

बस्तर के नक्सल प्रभावित इलाकों में सुरक्षाबलों ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी रणनीति बदली है। अब सरकारी योजनाओं, पुनर्वास अभियानों और सामुदायिक कार्यक्रमों की जानकारी स्थानीय भाषाओं गोंडी और हल्बी में दी जा रही है। इसका असर भी दिखने लगा है और धीरे-धीरे स्थानीय बोली की ताकत ने बंदूक की धार को कुंद करना शुरू कर दिया है।

बीजापुर जिले के पुलिस अधीक्षक Jitendra Yadav का कहना है कि बंदूकें जंग जीत सकती हैं, लेकिन लोगों के दिल नहीं। संवाद और भरोसा ही स्थायी समाधान की राह खोलते हैं। इसी बदली रणनीति का असर है कि पिछले दो वर्षों में 2,700 से अधिक माओवादी मुख्यधारा में लौट चुके हैं।

70 प्रतिशत आदिवासी हिंदी नहीं बोलते

स्थानीय भाषा और संस्कृति के विशेषज्ञ Dr. Gangaram Madhur बताते हैं कि दंतेवाड़ा, बीजापुर, सुकमा और नारायणपुर के अंदरूनी इलाकों में करीब 70 प्रतिशत आदिवासी हिंदी नहीं बोलते। उनके जीवन की भाषा गोंडी, हल्बी, भतरी और धुरवी है।

करीब चार दशक पहले जब माओवादी बस्तर पहुंचे तो उन्होंने इसी भाषा की खाई को अपने पक्ष में इस्तेमाल किया। लोकगीत, सांस्कृतिक कार्यक्रम और नाट्य मंडलियों के जरिए गांव-गांव में अपनी पैठ बनाई। चेतना नाट्य मंडली जैसे मंचों ने ‘जल-जंगल-जमीन’ का संदेश स्थानीय बोली में फैलाया। Raju Bagh, जो केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के पूर्व अधिकारी रहे हैं, बताते हैं कि माओवादियों ने जल्दी ही समझ लिया था कि भाषा और संस्कृति के जरिए लोगों तक पहुंचना बंदूक से कहीं ज्यादा प्रभावी है।

स्थानीय बोलियों में चल रहे 10 से अधिक अभियान

आदिवासी समाज का भरोसा जीतने के लिए बस्तर में राज्य सरकार और जिला प्रशासन ने कई अभियान शुरू किए हैं, जो पूरी तरह स्थानीय भाषाओं में चलाए जा रहे हैं। इनमें ‘पुना मारगेम’ (पुनर्वास से पुनर्जीवन), ‘नियद नेल्ला नार’ (हमारा अच्छा गांव), ‘मावा केतुल’ (हमारा पुलिस घर), ‘मनवा पुलिस मनवा नाटे’ (चलित थाना), ‘लोन वर्राटू’ (घर आओ) और ‘मनवा नवा नार’ (हमारा नया गांव) जैसे अभियान शामिल हैं। इन पहलों ने ग्रामीणों और सुरक्षाबलों के बीच संवाद का पुल मजबूत किया है।

आकाशवाणी की आवाज जंगलों तक पहुंची

बस्तर के कई इलाके ऐसे हैं जहां न सड़कें हैं और न ही मोबाइल नेटवर्क की सुविधा। ऐसे में रेडियो आज भी सबसे भरोसेमंद माध्यम बना हुआ है। पांच से 25 फरवरी तक चले एक विशेष अभियान में गोंडी और हल्बी भाषा में माओवादियों के परिजनों ने उनसे मुख्यधारा में लौटने की भावुक अपील की। इस पहल को मजबूत करने के लिए Central Reserve Police Force ने सामुदायिक पुलिसिंग कार्यक्रम के तहत करीब 10 हजार रेडियो ग्रामीणों में बांटे।

गोंडी भाषी जवानों की भर्ती से बढ़ी इंटेलिजेंस

वर्ष 2010 में हुए Tadmetla attack 2010 में 76 जवानों के शहीद होने के बाद सुरक्षा तंत्र ने अपनी रणनीति की गहन समीक्षा की। जांच में यह सामने आया कि स्थानीय खुफिया तंत्र की कमजोरी का बड़ा कारण भाषा की बाधा थी।

इसके बाद भर्ती प्रक्रिया में बदलाव किए गए। बस्तर के युवाओं के लिए न्यूनतम शैक्षणिक योग्यता पांचवीं पास रखी गई, कद में छूट दी गई और एसपीओ, बस्तर फाइटर तथा डीआरजी जैसे स्थानीय बलों का गठन किया गया। पिछले एक दशक में करीब 12 हजार जवान भर्ती हुए, जिनमें लगभग 60 प्रतिशत गोंडी भाषा बोलने वाले हैं।

बस्तर रेंज के आईजीपी Sundarraj P. का कहना है कि सुरक्षा की इस लड़ाई में निर्णायक मोड़ संवाद से आया है। जब तक स्थानीय समाज की भाषा, संस्कृति और मनोविज्ञान को नहीं समझा जाएगा, तब तक स्थायी शांति संभव नहीं है। स्थानीय युवाओं की भर्ती से जहां खुफिया तंत्र मजबूत हुआ है, वहीं सुरक्षाबलों के प्रति लोगों का भरोसा भी बढ़ा है।