गढ़वा के लरहरा गांव में टूटी 400 साल पुरानी परंपरा! पंचायत से सीधे थाने पहुंचा मामला, इलाके में चर्चा तेज
झारखंड के गढ़वा जिले से एक हैरान करने वाली खबर सामने आई है। भवनाथपुर प्रखंड का लरहरा गांव, जो पिछले करीब 400 वर्षों से अपने सभी विवाद पंचायत स्तर पर सुलझाने की परंपरा के लिए जाना जाता रहा है, अब एक मामले को लेकर सुर्खियों में है। बताया जा रहा है कि पहली बार गांव का एक विवाद पुलिस थाने तक पहुंचा, जिससे पूरे क्षेत्र में चर्चा का माहौल बन गया।
400 साल से थाने तक नहीं पहुंचा कोई मामला
गढ़वा जिला अंतर्गत भवनाथपुर प्रखंड के लरहरा गांव में कोरवा जनजाति के करीब 40 परिवार रहते हैं। यह जनजाति आदिम जनजाति की श्रेणी में शामिल है। ग्रामीणों का दावा है कि उनके पूर्वजों के समय से लेकर अब तक गांव का कोई भी विवाद थाने में दर्ज नहीं हुआ। हर छोटा-बड़ा मामला पारंपरिक पंचायत के जरिए ही सुलझाया जाता रहा है।
आपत्तिजनक स्थिति में देखे गए चाची-भतीजा
हाल ही में गांव में एक संवेदनशील मामला सामने आया। जानकारी के अनुसार, चार बच्चों के पिता और चार बच्चों की मां को आपत्तिजनक स्थिति में देखा गया। दोनों रिश्ते में चाची-भतीजा बताए जा रहे हैं। मामला सामाजिक मर्यादा से जुड़ा होने के कारण गांव में हलचल मच गई और तत्काल पंचायत बुलाई गई।
महिला ने थाने में दर्ज कराई शिकायत
इसी दौरान संबंधित महिला ने गांव वालों पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए थाने में शिकायत दर्ज करा दी। सूचना मिलते ही पुलिस हरकत में आई और ग्रामीणों को पूछताछ के लिए बुलाया गया। थाने पहुंचे ग्रामीणों ने पुलिस को बताया कि 400 वर्षों से गांव का कोई मामला थाने तक नहीं गया है और वे आगे भी पंचायत व्यवस्था के तहत ही समाधान चाहते हैं।
पुलिस ने पंचायत पर छोड़ा फैसला
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पुलिस ने सीधे हस्तक्षेप से परहेज किया और मामला पंचायत के भरोसे छोड़ दिया। बाद में पंचायत ने दोनों पक्षों को कड़ी चेतावनी दी और माफी के साथ विवाद का निपटारा कर दिया।
परंपरा और भाईचारे पर गर्व
गांव के बुजुर्ग रामपृत कोरबा, बिठल कोरबा, मुंद्रिका कोरबा, मणि कोरबा और सुरेंद्र कोरबा का कहना है कि उनके पूर्वजों के समय से ही गांव में यह नियम चला आ रहा है कि हर विवाद पंचायत में ही सुलझाया जाएगा। उनका मानना है कि इसी व्यवस्था के कारण गांव में आपसी भाईचारा कायम है।
लरहरा गांव के लोगों का मुख्य पेशा जंगल से लकड़ी काटकर उसे भवनाथपुर बाजार में बेचना है। आधुनिक दौर में भी यह गांव अपनी परंपरागत सामाजिक व्यवस्था और सामुदायिक एकजुटता को बनाए रखने के लिए पहचाना जाता है।
